मंगलवार, 7 मार्च 2017

आज कु गढ़वलि जन-जीवन

कुछ दिन पैलि अपणा गां मा छाई। ई दा पूरा पौणा तीन सालका बाद गढ़वालका अपणा गां, घार-गुट्ठयार, गाला-बूणा द्यखण कु मौका मील। एक त गढ़वाल पलायन फर पलायन झ्‍यलणू च मथि भटै आधुनिक चीज-बस्तियूं कु वजै से गढ़वाल कु बच्‍यूं-खुच्‍यूं जनजीवन भि ग्रामीण कम अर शहरी ज्‍यादा लगणू। बूढ-बुड्य्या खुणै सकिणी-पकिणी हुंईं च। ऊंका समझम कुछ नि आणि च कि ऊंल इन हालातुंमा करणु च त क्‍या करण। बल्कि यो भि बुलै स‍कद कि अब गांव-गढ़वालका बूढ-बुड्य्यों क समिणी भि पुरणि अर नै जिंदगी में से नै जिंदगी दगड़ चलण कु ही विकल्‍प बच्‍यूं च।
       आज कतगै लोग ब्‍वना छिं कि आंचलिक भाषा खत्‍म हूणीच, गढ़वलि बोली क्‍वी नि ब्‍वल्‍दू पर लोगुं थै यो जरूर स्‍वचुण चैंणु च कि अपिणी भाषा या बोलि तबी बच सकद जब वीं भाषा या बोलि कु समृद्ध जीवन बचलु। जबरि तक पुरणू आत्‍मनिर्भर ग्रामीण जीवन अस्तित्‍व मि नि आलु तबरि तक भाषा या बोलि थै सिर्फ लेखिकी या बोलिकी देर तक जिंदा नि रखे जा सकुद।
       झणि कतगा पतन अबि और द्यखण पहाड़ुं का जन जीवनल। मी थै त इन लगणूच कि गढ़वालम रैण वला गढ़वलि मनिख शहरूं मनिख्‍यूं से भि ज्‍यादा बिगड़ गीं। ऊं का भाव, विचार अर सोच-समझ सब्‍ब आत्‍मघाति राजनीति क चक्‍करमा पतित ह्वै गयाई।
       उन त वर्षूं पैलि भि गांवका लोगुंमा आपसि मतभेद रैंदा छाई पर वै वक्‍त मतभेदु का कारण ………. जारि 

3 टिप्‍पणियां:

  1. दुखद है कि बदलाव की हवा आज ग्रामीण अंचल को भी अपने प्रभाव में ले रही है.

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  2. सही बात च अपरि बोली तब बचलि जब अपरि संकृति बचलि....हमर गढवाल मा क्या हुणा स्यू त पता नी सालों बीति गेन वख जाण नि ह्वाई पर वखक लोग शहरु मा ऐकि यन रूप बदलणा छन अपरि भाषा बुलण मा शरम आँदि और कई त अफ तै गढवालि बताण मा हिचकणा छन.....
    बहुत बढ्या लेख लिख्यूं वूभि अपरि भाषा मा..
    बहुत बहुत धन्यवाद आपक।
    http://eknayisochblog.blogspot.in

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  3. कुछ नि रै गौंमा कैकू लुट्यार-कुट्यार,
    सूनूँ पड़्यों च सबकू घौर-गुठ्यार,
    जु छा मनखी वू सब्बि उन्दू गैन,
    पुंगड़ी-पटयाली बांजी, कूड़ी खंद्वार।

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